Another attempt to write a Gazal – hope you like it.

बेफिक्र मुसाफ़िर को, मंजिल की जरूरत क्या है ?
रास्तों पर जो पाते हैं सुकून उन्हें, किसी मुक़ाम की जरूरत क्या है ?
कैद में बेचैन रही मेरी रूह, जमाने के रिवाजों की दीवारें हैं बुलंद
अनजान महफिलों में बेवजह, हर दम मुस्कुराने की जरूरत क्या है ?
सुनते आए हैं लोगों से अक्सर, मर्ज़ लाइलाज है ये लेकिन
दर्द जो हद से गुजर जाए, तो उसे दवा की जरूरत क्या है ?
आया था समुंदर डुबाने मुझे, और लहरों में घिरी थी कश्ती मेरी
खेलना तूफानों से सीखा है जब से, भला मुझे साहिल की जरूरत क्या है ?
एक दिन हो के खुद से रूबरू, दिल में पाया खुदा को मैंने
दो दुनिया जो एक हुयीं तो पूछा उसने, अब तुझे आईने की जरूरत क्या है ?
दिल ही दिल में जो होती है गुफ्तगू, धडकनें समझती हैं खामोशी की जुबाँ
होंठ ना खुले ही तो बेहतर है “अभी”, हाल-ए-दिल सुनाने की जरूरत क्या है ?
Leave a comment