जब दिल से ये पूछा…

हैरान इन निगाहों ने नजारों से ये पूछा ।
रातों में चमकते हुए सितारों से ये पूछा ॥ १ ॥

सदियों से गुजरें हैं दिलों के कारवां यहाँ ।
कैसे उमड़ा ये तूफान बहारों से ये पूछा ॥ २ ॥

था इक इंसान जिसे मिटानी थी ये दुनिया ।
हो कर मजबूर उस रक़ीब से ये पूछा ॥ ३ ॥

“क्या पा लिया आखिर दिल का सुकून तुमने ? ।
या थी सिर्फ एक इंतक़ाम की आग ?”, ये पूछा ॥ ४ ॥

“मुहाफिझ तेरा घर सोंप गया मुझे, नादाँ ।
छोडता मौका कैसे ? “, उसने मुझे ये पूछा ॥ ५ ॥

खामोश रहा चल दिया अपनी ही धुन में ।
“क्यों भूले वफा?” मैंने जो मुहाफिझ से ये पूछा ॥ ६ ॥

“परवरदिगार क्यों कभी ढाए ऐसा जुल्म” ।
फिर मैंने इक फर्याद में मौला से ये पूछा ॥ ७ ॥

चल रहा हूँ शीशे पे | घायल है दिल मेरा ।
कैसे मैं बचूं तू बता, मैंने खुदा से ये पूछा ॥ ८ ॥

बन खुद का सहारा, 'अभी' ना आयेगा कोई ।
आया ये जवाब जब मैंने दिल से ये पूछा ॥ ९ ॥
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मुहाफिझ = a protector, a guardian
रक़ीब = rival, enemy
इंतक़ाम = revenge
सुकून = tranquility, peace

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